Wednesday, May 21, 2014

ज़िन्दगी की सच्चाई...

माँ से कह तो दिया था उसने कि उसके जाने से कुछ फ़र्क नहीं पड़ेगा पर क्या सच में फ़र्क नहीं पड़ता? सवाल बड़ा ही चुभने वाला था पर वो सच्चाई को झुटला देना चाहता था । कैसे वो जी पायेगा उसके बिना ये तो कभी सोचा ही नहीं था उसने पर फिर भी उसने सबकी ख़ुशी के लिए खुद को इस बात से आश्वत कर लिया कि अगर वो मेरी क़िस्मत में नहीं होगी तो कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा । पर सवाल ये था कि क्या वो सच में खुश रह पायेगा, कई दिनों से ये सवाल दिल में कौंध रहा था क्या होगा उसका उसके बिना जिसके बिना वो जीना भी नहीं चाहता ? क्या होगा उसका जो वो किसी और का हो गया चाहते न चाहते ? जिसके दो पल गायब होते ही उसकी धडकनें रुक जाती है कैसे जी पायेगा उसके बिना पर शायद यही ज़िन्दगी की सच्चाई है कि

बिछड़ता वो ही है जो मेरा अपना है,
वरना, ग़ैरों का फुरसत मुझसे दिल्लगी की ।

पर, वो दुनिया से कहना नहीं चाहता कि "हाँ! आदत है वो मेरी" और नहीं जीना चाहता उसके बिना...पर वो जानती है कि क्या है वो उसके बिना, वो जानती है कि पूरा हो कर भी अधूरा है वो उसके बिना ।

बहुत सी वफ़ाए लिए चल रहा है अभिनव,
फ़कत तुझ संग ज़िन्दगी की ख़ातिर ।

प्रतिभा की धनी है?

बड़ी अजीब सी व्यथा थी उस पिता की जिसकी लाड़ली अपंग थी, वो कुदरत की ही तो देन थी जिसको उसने इतने सालों से लाड़-प्यार से पाला था । तो क्या हुआ जो वो अपंग है, वो प्रतिभा की धनी है उसकी कलाकृति दुनिया भर में मशहूर है । तो क्या हुआ जो वो सिर्फ एक हाँथ की धनी है, उसके एक हाँथ से बनाए हुए चित्र सबको चकित कर देते है, उसके रंग बोलते है, अपनी कहानी कहते है, हँसाते है और रुलाते भी है । क्या प्रतिभा एक सुखी जीवन का पर्याय नहीं हो सकती या उसके लिए कोई बना ही नहीं ?

अपनी इसी व्यथा और रोज़-रोज़ के तानो के चलते उसने खुद को अपनी ही रंगों की दुनिया में समेट लिया था और करती भी क्या वो उन रिश्तेदारों का जो उसकी अपंगता को अभिशाप मानते थे । उस माँ का दिल रोज़ रोता था जब भी कोई उसकी लाड़ली को कुछ कहता । उस पिता का कलेजा रोज़ जलता जब भी कोई उसके दरवाजे से उसकी लड़की को न कर चला जाता । क्या कमी थी उसमे बस एक हाँथ ही तो नहीं थी । उसने तो खुद को कभी अपंग नहीं माना तो दुनिया को उसको अपंग मानने लगी ? पच्चीस की ही तो हुई थी वो, कोई उम्र तो नहीं निकली थी फिर क्यूँ सबको उसको दूर करने की पड़ी थी ? वो पहले भी किसी पर बोझ नहीं बनी तो क्यूँ अब लोग उसको किसी पर बोझ बना देना चाहते है ? क्या समाज के बंधनों में आज भी बंधना जरूरी है ? पर व्यथा उस पिता की थी जो उसकी लाड़ली को खुशियाँ और समाज जो जवाब दोनों को साथ ले कर चलना चाहता है ।

आएगा किसी रोज़ एक राजकुमार घोड़े पर चढ़ कर,
और ले जायेगा तुमको दूर गगन में,
खुशियाँ भी होंगी, रंगत भी होगी,
उस प्यार के चमन में,
कोई बाधा न होगी, कोई अपंगता न होगी,
उस नील गगन में,
आएगा किसी रोज़ एक राजकुमार घोड़े पर चढ़ कर,
और ले जाएगा तुमको दूर गगन में ।

Thursday, May 1, 2014

इंतज़ार...

बड़ा अकेला सा महसूस कर रहा था वो, शायद रात कुछ ज्यादा गहरी थी । करवटें और बेचैनियाँ लिए वो पलटता रहा पहर-दर-पर उस सुबह के इंतज़ार में या यूँ कहूँ उस आवाज़ के इंतज़ार में जिसे वो उस पल सुनना चाहता था । यही तो था उसका दिन या कहूँ रात...पर उसकी आवाज़ नहीं आई । शायद…

मायूस सी बैठी थी रात,
जैसे खुद बुझ कर आई हो ।

अजीब सा मौसम बना हुआ था अन्दर, शायद लफ़्ज़ों का घमासान हो रहा था, बेचैनी बढ़ती चली जा रही थी करवटें बदलती सुइयों की तरह और वो उस उद्देढ्बुन में खोया जा रहा था कि क्या हसरतें पालना गलत है? 

कौन चलता है यहाँ उम्र बसर होने तक,
हर कोई है मुसाफ़िर तन्हा राह का ।

ख़ैर! अश्क़ों का काफ़िला भी अजीब होता है, कहते है जहाँ दबाने की आरज़ू होती है वहीँ फूट पड़ता है ।

रातें गुज़री है ये भी गुज़र जायेगी,
यादों का कुछ रश्क़ लिए ।

Sunday, April 27, 2014

सफ़र...

बस में मिला था वो चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लिए, मानो बहुत सा गम छुपाये बैठा हो । मैं सरकते-सरकते उसके पास पहुंचा, चेहरे के बदलते भाव मानो कुछ कहना चाह रहे हो । पर वो शायद जवाब नहीं देना चाहता या जवाब था ही नहीं उसके पास । उसकी लम्बी-लम्बी सांसें मुझे अनयास ही उसके ओर खींच रही थी मानो जैसे लड़ रहा हो ज़िन्दगी के लिए । मैंने पानी बढ़ाते हुए पुछा ठीक हो? कहने लगा हाँ! बस सांस की तकलीफ है, इस शहर में घुआ थोड़ा ज्यादा है पर उसकी पथराई आँखें कुछ और ही कह रही थी मानो जैसे रो लेना चाहती हो और वो...

छुपा बैठा मुझसे नज़रें वो ऐसे,
जैसे बरसों का रो कर आया हो ।

बार-बार आँखों के कोने साफ़ करता और मेरे देखने पर कहता कि आँख में कचरा चला गया है । क्या रोने या आँख में कचरा होने में अंतर नहीं? मेरे दिल में उठते सवाल मुझे कचोट रहे थे और मैं उसके चेहरे की ओर बस एक टक देखे जा रहा था । मैं बार-बार उसकी ओर देखता और वो मुझसे नज़रें चुरा लेता, थोड़ा हाफता और फिर आँखों के कोने पोछता जैसे सुबुक रहा हो अन्दर ही अन्दर । मुझसे रहा नहीं गया, पूछ लिया और वो पथराई आँखों से मुझे देखता रहा । मैं सवाल न कर सका और वो बिना कहे सब जवाब दे गया । जाते-जाते उसने बस इतना सा सवाल किया "क्या गलतियों की वजह मैं ही हूँ?" और मैं उसकी भीगी आँखों को बस देखता रहा । आँखें पथराई थी और शायद कन्धा खोज रही थी बस बिना रुके रो लेने के लिए और पलट कर कहता गया...

कितना लम्बा है ये सफ़र,
चंद कन्धों की ख़ातिर ।

और मैं बस उसको जाते देखता रहा बेबस लाचार सा ।

Thursday, October 24, 2013

चेहरा बोलता है...

एक सवाल अपनी मुठ्ठी में लिए घूम रहा था वो, चेहरे पर जवाबों की झुर्रिया नज़र पड़ने लगी थी । मेरे सामने से गुज़रा तो नज़र पड़ी, मुठ्ठी बंधे छुपाये-छुपाये चला जा रहा था । मैंने पूछना चाहा तो देखने लगा मेरी ओर टकटकी लगाये । मेरे चेहरे की जिज्ञासा पढ़ वो मेरे पास आया और धीरे से सवाल पुछा कि क्या मैं अच्छा नहीं दिखता?
गहरा सन्नाटा था । जवाब बहुत थे मेरे पास कहने को, पर उसको शायद झूठी तस्सल्ली ही लगती । बहुत खूबसूरत नहीं दिखता था वो, दुबला-पतला सरल सा दिखता था बिना किसी लाग-लपेट के अपनी ही धुन में रहने वाला सा था वो पर कहीं न कहीं दिल का हीरा था, हँसमुख और मिलनसार मानो अभी अपनी बातों से दिल जीत लेगा । पर, आज हताश नज़र आ रहा था, मैंने पूछना चाहा पर कुछ बोला नहीं, बस जाते-जाते हलके से कह गया...

दर्द उसने दिया जो मेरा अपना था,
वर्ना गैरों का कहाँ फुरसत मुझे चोट पहुंचाने की ।

और, मैं हैरान था उसकी चोट करती बातों से, क्या चेहरा सच में इतना मायने रखता है? या साफ़ दिल का इस शहर में कोई मोल नहीं? और मैं अपनी उधेड़बुन में उसको दूर जाते हुए देखता रहा ।

दिखता है चेहरा ही बाज़ार में,
यहाँ इश्क़ में दिल नहीं दिखा करते ।

Sunday, October 20, 2013

कूड़े वाली की लड़की…

उसकी माँ उसकी अधजली लाश लिए बिलख-बिलख कर रो रही थी, बस्ती में मातम सा छाया था, लोग तमाश-बीन हो एक दुसरे की निगाहों में सच तलाश रहे थे और मैं इस सोच में एक टक देख रहा था कि उस बच्ची की गलती क्या था? क्या खूबसूरती कलंक है? या यौवंता आज सामाजिक अभिशाप बन गयी है? अभी कुछ रोज़ पहले ही देखा था जब वो मुस्कुराती हुई घर में कूड़ा उठाने आई थी, चेहरे पर सादगी लिए वो मुस्कुराता चेहरा अपनी ही दुनिया की लालिमा लिए चमक रहा था, महज़ सोलह (16) की रही होगी, मद्धम सी आवाज़ में नमस्ते लिए वो धीरे से आई और कूड़ा लिए बाहर की तरफ दौड़ी चल दी । मैं लॉन में बैठा अखबार में जाने कौन से सच में तलाश में खोया हुआ था और उस लड़की पर नज़र पड़ी । खूबसूरती उसके यौवन को अलग ही निखार दे रही थी और मेरे ज़ेहन में उसके मायने आके जा रहे थे पर खूबसूरती घर या जात देख कर तो जन्म नहीं लेती ।

मैं अपने ही ख़्यालों  में था कि चलो अच्छा है कम से कम ये किसी अच्छे घर में तो जाएगी, जहाँ जायेगी अपनी खूबसूरती की तरह रंग बिखेरेगी और उन्ही बनते ख़्यालों में ही खोया रहा । तभी किसी का धक्का लगा और मेरा भर्म टूटा, देखा तो याद आया कि वो छोटी लड़की तो रही ही नहीं, जल गयी अपना रंग-रूप त्याग कर । कानों में खुस्पुसाहत पड़ रही थी और मन में एक अजीब सा करुणा-भाव था । मैं जानता नहीं था परन्तु फिर भी एक व्योग था, दर्द था । कानों में पड़ती आवाजें मुझसे कह रही थी उस लड़की की दास्ताँ । पड़ोस में खड़ी एक औरत ने दूसरी से कहा कि देखो बेचारी को, अभी तो जवान भी नहीं हुई थी की जला बैठी खुद को । तंग हो गयी थी रोज़-रोज़ के तानो से, छेड़-छाड़ से । कहती थी कूड़ा उठवाने के बहाने कोई पीछे हाथ लगाता तो कोई आगे और तो कोई घर के अन्दर तक खीच ले जाता, थक चुकी थी छेड़-छाड़ से, उसका अपना ही रंग उसका दुश्मन बन बैठा था तो सुबह काम से आने के बाद जला बैठी खुद को, क्या हुआ था कोई नहीं जानता बस उसको रोते आते देखा था और ये कहते-कहते वो औरत रोने लगी ।

मैं हताश था सामाजिक परिवर्तन और गन्दी मानसिकता को ले कर । क्यूँ यौवन, रंग-रूप और चेहरा खुद का ही दुश्मन बन बैठा है और कैसे कुंठित समाज में जीने लगा हूँ मैं जहाँ बस जिस्म की भूख लगी है भेड़ियों को । अख़बार लबालब है ऐसी ख़बरों से जहाँ सिर्फ़ औरतों पर शोषण है और कहीं न कहीं हम भी भागीदार बनते जा रहे है इसी गन्दी मानसिकता के ।

मुझसे रहा न गया तो चल दिया अपने उधेड़बुन के ख़्याल लिए और सोचता रहा क्या खूबसूरत होना गुनाह है? या किसी ग़रीब का खूबसूरत होना गुनाह है?

नारी की भी अलग कहानी, जो समझे जो जानी,
नर्लज समाज, जली सभ्यता, जिस्म की भूख बस मानी,
नोच-खसोट लूट रहे अस्मिता, जो भुगते वो जानी,
रौद्र रूप की भेट जरूरी, संघारक त्यों मानी । 

Friday, September 20, 2013

कोरे पन्ने...

भीगी आँखों में उसने कलम उठाया और कोरे पन्ने भरने लगा, पर लिखता क्या यही सोच-सोच कर बस आँखें नम करता रहा । पर क्यूँ उदास था वो? यही तो वो हमेशा से चाहता था कि कोई उसे प्यार करे पर यह जरूरी तो नहीं की वो भी उसे उतना ही प्यार करे जितना की वो करने लगा है । बड़ी दुविधा में, उलझे ख़्यालों में बस कुछ-कुछ लिखता और मिटा देता पर उसको शायद यह ही समझ में नहीं आया था कि इंसान चाहता वही है जो मिलता नहीं ।

मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था और करता भी क्या यह तो इंसानी स्वभाव है, कोई अपनी मर्ज़ी से तो भावुक नहीं होता न, यह तो आत्मीय गुण है किसी में कम तो किसी में ज्यादा । खैर, मैंने उसे टोका तो वो मेरी तरफ पलटा । सुर्ख़ गीली आँखें झांक रही थी और मैं उनमे अपने सवालों के जवाब ढूँढ रहा था कि क्या किसी से इतना जुड़ा होना गलत है?

मेरे ज़हन में सवाल घर कर रहे थे और उसकी आँखों का प्यार डर का रूप ले रहा था और उसने वो भीगे पन्ने फाड़ दिए । एक टक देखता रहा और फिर भीगी आँखों से लिखने लगा कुछ-कुछ...

दर्द तो मुझे मेरे अपने ही देते है,
कोई ग़ैर तो बस चोट करने की सोचता है ।

Thursday, September 19, 2013

अँधे की लाठी...

बड़ी बेचैनी में उठा वो और लड़खड़ाते हुए रेल के गेट पर जाने लगा और कहने लगा मेरा फ़ोन, मेरा फ़ोन । मैं पलटा उसकी ओर तो उसकी सफ़ेद छड़ी और सहारा खोजते हाँथ नज़र आये । दोस्तों ने संभालते हुए उससे पुछा क्या हुआ तो वो बोला कि वो लड़का कहाँ गया जो मुझे छोड़ने आया था, उसके पास मेरा फ़ोन है । सब बोले की वो तो चलती रेल में से उतर गया, क्या तुम्हारा फ़ोन उसके पास था ?

सवाल बड़ा मामूली था परन्तु मैंने एक भरोसा टूटते हुए देखा । मुझसे रहा न गया और मैंने उसको पुछा तुमने अपना फ़ोन उसके हाँथ में क्यूँ दिया था वो तो फ़ोन ले कर उतर गया और अब तो रेल भी चल चुकी है । वो बोल भैया, उसको किसी से बात करनी थी और मुझको बोल की मैं यही स्टेशन पर काम करता हूँ इसी वजह से मैंने उसको बात करने के लिए फ़ोन दे दिया था और वो मेरा फ़ोन ले कर उतर गया, क्या आप उससे कॉल लगा कर कह दोगे की मेरा फ़ोन लौटा दे ? मैंने उसको संभालते हुए कहा कि देखो भाई, वो फ़ोन उसने अब तक बंद भी कर दिया होगा अब तो मुश्किल ही मिलेगा तो वो बोल की मुझे रोज़ मिलता था और कहता था की मैं यहीं स्टेशन पर काम करता हूँ ।

मैं दिलासे के सिवा कुछ भी नहीं दे सकता था इसलिए उसको समझाते हुए बिठा दिया और थोड़ी देर बाद बात आई गयी हो गयी । सवारियां अपने यथा-स्थान पर वापस बैठ गयी जैसे अक्सर तमाशा ख़त्म होने के बाद होता है, दोस्त लोग वापस अपनी मस्ती में लग गए, मैं भी वहीँ था परन्तु मन अस्थिर था, सवाल कौंध रहे थे, क्या भरोसा करना इतना महंगा है या इंसान की भूख इतनी बढ़ गयी है की वो अँधों को भी नहीं छोड़ता ? मैंने पढ़ा था कि लूटने वाला लाश को भी नंगा कर सब लूट ले जाता है पर यकीन नहीं था, लगता था कहानियों का हिस्सा है, अपितु आज सामने देख यकीन हुआ कि कितना गिर गया है इंसान, क्यूँ नहीं सोचता कि क्यूँ कर रहा है, क्या कर रहा है बस कर रहा है ।

और वक़्त हैरान-परेशान सा देख रहा है ।

लूट रहे है नंगे तन से एक-एक ग़ोश्त,
ऐसी भी क्या मुफ़लिसी छाई शहर में ।

Thursday, August 1, 2013

वो...

कल मिला था वो, बहुत परेशान नज़र आ रहा था मानो जैसे कुछ खो गया हो ।  मैंने रोका और पूछना चाहा कि क्या हुआ? क्यूँ इतने अधीर से हो कर भटक रहे हो? कुछ बोला नहीं बस एक तक मेरी आँखों में देखा और नज़रें चुराये दौड़ गया । तब तक भागता रहा जब तक मेरी नज़रों से वो ओझिल नहीं हो गया, पर खुद से कैसे भागता? भाग तो उससे रहा था जो उसके अन्दर दबा हुआ था । मैंने कोशिश की उसे पकड़ने की, समझाने की, परन्तु नहीं माना और दूर तक चलता चला गया और जाते-जाते कहता गया कि इतनी दूर चले जाना चाहता हूँ जहाँ "मैं" सुनाई न दूं । मैं सोच में था और उसने पलट कर मुझे देखा और आँखों ही आँखों में पुछा कि क्या कोई जगह है ऐसी? और मैं कोई जवाब न दे सका ।


मैंने देखने की, उससे खोजने की बहुत कोशिश की पर शायद वो बहुत दूर निकल चुका था और अपने पीछे एक खालीपन का एहसास छोड़ गया था, वो एहसास जो मुझे अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा था । मैं हताश हो घूमने लगा, मैं परेशान था कि कहीं मैं भी उसके जैसा न हो जाऊं । क्या करूँगा मैं अगर मेरे सामने भी ऐसा वक़्त आया तो? मैं तो किसी को जानता तक नहीं बस उसके सिवा । और "वो", वो मुझसे उस कल के लिए अनजान थी जो न जाने कब आएगा । शायद उसका भी यही हाल होगा जो वो भाग रहा था, खुद से ही दौड़ रहा था पागल ।

पर, कब तक दौड़ता? एक दिन तो उसे सच को मानना ही था कि वो अकेले रह गया सिर्फ इसलिए की वो चल नहीं सका । और मैं इस उधेड़बुन में था कि "क्या मेरा कल यही है"? बेचैन हो उठा, तड़पने लगा, ऐसा लगने लगा मानो किसी ने छुरी को तपा कर धीरे से कलेजे में उतार दिया हो और धीरे धीरे क़त्ल करते हुए मुझ पर हँस रहा हो । मैंने रोकना चाहा पर न वो रुका और न ही मैं रुक पाया ।

और...
क़त्ल मेरे अरमानों का हुआ कुछ इस कदर,
कि मैं हँसता भी रहा और रो न सका ।
बे-मुराद सी मोहोब्बत भी जालिम निकली,
मैं करके भी सह न सका ॥ 

Thursday, July 11, 2013

घरौंदे का पंछी...

मैं बहुत उधेड़बुन में था कि कैसे बयान करूँ उस लड़की की हकीक़त जिसने अभी दुनिया देखनी शुरू की हो, मेहनत शुरू की हो, अपने लिए सोचना और समझना शुरू किया हो । बड़ी बेचैन थी मेरी सांसें जो अन्दर से कचोट रही थी कि कुछ कहो, ऐसे कब तक चुप बैठोगे । सवाल कठिन जरूर था पर जवाब तो देना ही था...

छोटी-छोटी इच्छाओं का घरौंदा बांधे उसने चलना शुरू किया, कुछ पंख लिए और अपने घोसले से बाहर की तरफ झाँका, कोई था नहीं सँभालने को पर फिर भी दूर उड़ते हुए साथियों को देख हौसले बुलंद किये और कूद उठी ज़िन्दगी के मैदान में । उड़ते हुए उसने पंख हासिल किये और ज़िन्दगी के असली सफ़र की तरफ उड़ना शुरू किया पर ये क्या? शिकारी ने पंख काटने के इरादे से उससे घोसले में बुलाया, शिकारी अपना था, मालूम था नुक्सान नहीं करेगा इसलिए चलने की ठानी!

उलझन बहुत थी मन में, क्या करे, कैसे बचे ज़िन्दगी के भवर से, कैसे समझाए कि नहीं तैयार वो पिंजरों में रहने के लिए, कैसे समझाए की अभी और आस्मां जीतने है, उड़ना है, दुनिया देखनी है, कैसे बतलाये की जो तुमने सोचा है मैं उसके लिए तैयार नहीं । पर वो न नहीं कह सकती थी, कैसे कहती कोई हस्ती नहीं थी और किस से कहती वो जो अपना है? मन-मंथन में उड़ते-उड़ते टकरा बैठी साथ के एक परिंदे से, परिंदा था छोटा परन्तु तेज़ था, देखते है दुविधा भाप गया और वो चिड़िया भी अपने मन का बोझ नहीं सह सकी, रो पड़ी और कह दी आप बीती । परिंदे ने समझाया, बुझाया, हंसाया थोड़ा रुलाया भी और अपने लिए लड़ना सिखाया, कि एक दिन तुम्हे खुद अपने लिए खड़ा होना पड़ेगा और ये सोचो की वो वक़्त आज है, इसलिए अपने लिए खड़े हो, लड़ो और हथियार मत डालो ।

और चिड़िया बोली "क्या मैं उड़ नहीं सकती जैसे मैं उड़ना चाहती हूँ?"

क्या बस यह एक सवाल था?

Wednesday, September 19, 2012

झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं...

झूठ या फिर एक सफ़ेद सच दिल बहलाने के लिए की इंसान सच सुनने के काबिल नहीं । वो सुनना वही चाहता है जो उसके दिल को सुकून दे, उसकी अंतर-आत्मा को शिथिल न करे परन्तु फिर भी कहीं न कहीं एक जिज्ञासा होती है वो अनचाहा सच जानने की जो हमारे दिल को पीड़ा और ग्लानि से भर दे और अंतर-मन को टटोले और पूछे कि क्या इसी सच की तलाश थी हमें?

ऐसी व्यथा-स्तिथि में मुझे पिताजी की एक पंगती खूब सटीक लगती है "कितना मुश्किल है किसी यंत्रणा में जीना और जीते चले जाना खुद के स्वाह होने तक"। अपितु हम जानते है कि ऐसी स्तिथि में मनोभाव कैसे होते है परन्तु फिर भी हम मीठे झूठ को पचा उस कड़वे सच से दूर भागते रहते है जो गाहे-बगाहे हमारी आँखों के सामने घूमता रहता है ।

झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं,
जान लो जो बात को, जिज्ञासा का कोई अंत नहीं,
आँख मूंदे, बाहें मोड़े, बैठे कब तक रहोगे,
आँख खोलो, सच को देखो, ऐसे कब तक रहोगे,
झूठ बोले हो पतन जो, राख आज कर दो मुझे,
ग्लानि भर जब आँख फेरों , भस्म तुम कर दो मुझे,
डोर जो हो कच्चे-धागे, बाँध लो हर कर मुझे,
मन बड़ा विचलित है मेरा, ध्यान भंग कर दो मुझे,
जान को जो बात को, जिज्ञासा का कोई अंत नहीं,
झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं ।

मैंने अपने छोटे-छोटे अनुभवों से सिखा है कि कितना मुश्किल है सच कहना झूठ के सामने, हम झूठ बड़ी आसानी से बोल लेते है परन्तु यह भी याद रखिये सच बोलने पर आपको यह याद रखने की जरूरत नहीं कि आपने सामने वाले को क्या बोला था । सच कड़वा जरूर है परन्तु सच, सच है । बहुत छोटा सा फासला है सच और झूठ के दरमियान पर झूठ बोलने से पहले एक बार सोचिये क्या आप झूठ बोल कर अपने प्रियजन के कोमल मन को ठेस तो नहीं पहुंचा रहे? 

हम सभी ने छोटे-छोटे झूठ बोल कर बहुत कुछ खोया है परन्तु मैं आशा करता हूँ कि अब हम गलतियाँ दोहरा कर खुद को ग्लानि का पात्र नहीं बनायेंगे क्यूंकि "झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं " ।  

Sunday, November 27, 2011

"मैं" अहेम या बगावत...

जल रहा हूँ अंगारों सा क्यूँ मैं, सांस लेना भी दुश्वार है,
जलकर राख भी नहीं होता यह जिस्म, जाने क्यूँ जीने की प्यास है,
अरमानों का क़त्ल रोज़ करता हूँ, तिल-तिल करके रोज़ मरता हूँ,
फिर भी ज़िन्दगी क्यूँ, यूँ मुझ पर मेहरबान है,
हर दम, एक अजब सी आग, जो घुटन बनने लगी है साँसों में,
मैं जानता हूँ, गल रहा है मेरा अहेम, फिर भी अहंकार की प्यास है,
झुंझलाहट, चिल्लाहट, जो दबी पड़ी थी, मेरे खून के कतरों में,
क्यूँ उबाल सी बन, बरसने लगी है मेरे लफ़्ज़ों में कहीं,
जुल्म और सितम, अब क्यूँ गवारा नहीं,
झूठ के बिना, क्यूँ सभी बेसहारा यहीं,
अरमानों का क़त्ल रोज़ करता हूँ, तिल-तिल कर रोज़ मरता हूँ,
फिर भी ज़िन्दगी क्यूँ, यूँ मुझ पर मेहरबान है,
जल रहा हूँ अंगारों सा, क्यूँ सांस लेना भी दुश्वार है,
जलकर राख भी नहीं होता जिस्म, जाने क्यूँ इसे जीने की प्यास है...

एक आग की तपिश सी महसूस होती है अन्दर, जो उबाल बन रगों में दौड़ने लगी है परन्तु मैं यह नहीं जानता की यह आग अहेम की है या बगावत की ? जानता हूँ इस आग से गलने लगा है मेरा शरीर परन्तु फिर भी इसे संभाले हुए चल रहा हूँ और अपने ही अहेम में कहीं जल रहा हूँ ।

खुद अपने ही लफ्ज़ अजनबी से लगने लगते है, तो कभी मेरे अन्दर गलते-मरते "मैं" को सहारा देते है परन्तु मैं यह नहीं जानता की यह सही है या गलत । हम इस छोटी सी ज़िन्दगी में कई किरदार निभाते है परन्तु अपने कर्त्तव्य को निभाते-निभाते हम अपने अन्दर के "मैं" को भूल जाते है । पर वो नहीं भूलता, वो पलता रहता है अन्दर-अन्दर, जलता रहता है और एक दिन खुद अपने आप को भस्म कर लेता है, अंत कर देता है खुद की ही वक्तित्व का या फिर कभी रौद्र रूप धारण कर सृष्टि-संघार कर देता है । 

तो जानिये अपने अन्दर के उन्ही सवालों को और पूछिए खुद से सवाल की क्या आप अपने लिए जी रहे है? उठाइए उन सवालों का पुलिंदा और खोजिये अपने "मैं" को!!!

Monday, November 21, 2011

रिश्तों की कच्ची डोर...

रिश्ता शब्द अपने आप में पूरी परिभाषा लिए हुए है परन्तु रिश्तों की अहेम पहचान उन कच्चे पलों में होती है जब इंसान को अपने सगे-साथियों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है | अपितु, वही एक पल ऐसा भी होता है जिसमे आपको अच्छे और बुरे दोनों रिश्तों की पहचान हो जाती है | हालांकि, रिश्ते परिभाषा से नहीं, विश्वास से बनते है, कहने को रिश्तों की परिभाषा विश्वास के कच्चे धागे से शुरू हो एक अनचाहे प्रेमसंबंध पर ख़त्म होती है जिसको लफ़्ज़ों में बयान करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है |

मुझे याद है, रिश्तों की परख सीखते हुए मुझे एक अनजाने शख्स ने यह सीख दी कि रिश्ते रेत की तरह होते है उन्हें मुठ्ठी में जितना कसकर बाँधने की कोशिश करोगे वो उतनी ही तेज़ी से हाँथ से फिसलते चले जायेंगे और एक वक़्त ऐसा भी आएगा की आपके हाँथ में अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा | हालांकि बाद में उनके दिए कटु-अनुभवों से मैंने सीखा की रिश्तों की सही पहचान कैसे की जाए |


आप सोच रहे होंगे की आज मैं अचानक रिश्तों की बात लेकर कैसे बैठ गया, वो कहते है न चोट लगने पर ही दर्द का सही एहसास होता है | हम सभी की ज़िन्दगी में कभी न कभी रिश्तों की परीक्षा की घड़ी जरूर आती है और जब सदियों पुराने रिश्ते टूटते है तो मन आप-व्यथा बताने की स्तिथि में नहीं होता, किसी अपने को खो देने वाले दर्द का ज्वर दिल में चढ़ता-उतरता रहता है और इसी मनोस्तिथि में हम रिश्तों की उन मीठी बातों को भोल जाते है जो शायद मेरे हिसाब से सबसे अहेम होती है क्यूंकि दुःख के पल तो रो कर भुलाए जा सकते है परन्तु ख़ुशी के पलों में हँसी को भूल जाना बेवकूफी है |


पर अहेम सवाल यह है कि रिश्तों में दरार क्यूँ आती है ?
हम अपने अहम्, ईर्ष्या और द्वेष की भावनाओं में बहते हुए यह भूल जाते है कि इस रिश्ते के न होने से ज़िन्दगी में कैसा बदलाव आएगा | हम विष-वचन तो याद रख लेते है परन्तु उन मधु-वचनों को भूल जाते है जो कभी उस अनजाने रिश्ते की जान थे, पहचान थे | और शायद इसी मनोस्तिथि में पड़ कर हम उन रिश्तों का त्याग कर देते है जो कभी ज़िन्दगी हुआ करते थे, उन रिश्तों को भूल जाते है जिसमे कभी सारी दुनिया समां जाती थी, उन रिश्तों को महसूस करना छोड़ देते है जो कभी धडकनों की तरह सुनाई देते थे |

तो उठिए और फिर से उन रिश्तों की टूटती डोर को थाम लीजिये जो जाने अनजाने में धीरे-धीरे हाँथ से छूटती जा रही है, बताएये उन रिश्तों को अपने दिल की परिभाषा जो सच में दिल को अजीज़ है और महसूस कीजिये एक स्वछंद नयापन अपने रिश्तों में...

Tuesday, November 15, 2011

कलम व्यथा...

कलम उठा यूँ लिखने बैठा, जाने किस-किस सोच में,
क्या लिखूं, क्या न लिखूं, के ताने-बाने में बुन कर रह गया,
हाल-इ-हसरत, कलम-इ-जुर्रत, लफ़्ज़ों में क्यूँ घुल गया,
क्या लिखूं, क्या न लिखूं, के ताने-बाने में बुन कर रह गया...

लफ़्ज़ों की दुनिया बहुत ही अजीब होती है, एक छोटी सी पंगति से राजा को रंक और रंक को राजा बना देती है | आज दुनिया ने कलम की शक्ति को तो पहचाना है परन्तु हम कभी-कभी उसके दुष्परिणामों को भूल जाते है | अपितु, लिखने के अभ्यास से यह तो साफ़ है कि आपके पास दिन प्रतिदिन शब्दों का शब्दकोष बढ़ता जाता है और साथ ही साथ बोलने और लिखने कि कला में भी निखार होता है |

आप सोच रहे होंगे कि आज अचानक मैं लिखने के मर्म को लेकर क्यूँ बैठ गया | हुआ यूँ, कि कुछ दिनों पहले अपने अहम् पर प्रश्नचिन्ह लगाते कुछ सवाल मेरे सामने आ खड़े हुए और यह सत्य है कि जब इंसान के अहम् के ऊपर बात आती है तभी मनोस्तिथि में सजगता भी आती है | खैर, सवाल था कि लिखने से किसी को क्या मिलता है ? मेरे लिए यह सवाल बड़ा ही रोचक था क्यूंकि इस प्रश्न का उत्तर तो मैं खुद भी खोज रहा था और रहा हूँ, हालांकि अभी भी कुछ यथाचित उत्तर तो नहीं है मेरे पास परन्तु एक अनायास ख़ुशी है जो शायद मुझे लिखने के बाद आती है | इस स्तिथि का आभास होते ही मैंने अचानक मिलने वाली खुशियों का कारण खोजना शुरू कर दिया और एक रात अचानक ही ख़ुशी का एक अजीब एहसास हुआ | यह एहसास अछूता नहीं था मुझसे क्यूंकि यह मेरा अपना एहसास था जो मुझे शायद लिखने पर मिलता है | वो कहते है न:


लिखत-लिखत कलम घिसे, गहरी होत दवात,
मन तरसे नए शब्दों को, बुझे न लिखन की प्यास,
कह अभिनव, नव-नूतन बनके, लिख दो दिल की आस,
मन तरसे नए शब्दों को, बुझे न लिखन की प्यास...

इंसान ख़ुशी के लिए ही इतनी जद्दोजहत करता है, अगर ख़ुशी का कोई ठिकाना ही न हो तो इंसान के परिश्रम का क्या फ़ायदा और मेरे हिसाब से कार्य वही करना चाहिए जिसमे ख़ुशी मिले | तो, मैंने तो अपनी ख़ुशी का स्त्रोत खोज लिया, आप क्या सोच रहे है... 

Monday, August 15, 2011

एक सोच...

सोच ! शायद इसकी शुरुआत उस मनोस्तिथि से होती है जिसमे आपके ज़ेहन में ख्यालों के काफिले तो चल रहे होते है अपितु उन्हें रोक और पूछ पाना बहुत ही मुश्किल होता है | ख्यालों के सिलसिले-ब-सिलसिले चलते हुए एक सोच पर अटक कर रह जाते है, एक अच्छी सोच !!! सोच का कोई दाएरा, कोई सीमा नहीं होती अपितु सोच तो बस बहती हवा की तरह होती है, स्वछंद एवं स्वतंत्र | 

सोच कभी बुरी नहीं होती यद्दपि सोचने वाला दिल या दिमाग अच्छा या बुरा होता है | हम किसी व्यक्ति-वेशेष को उसकी अच्छी या बुरी सोच के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते अपितु यह उसकी अच्छी और बुरी परिस्तिथियों पर निर्भर करता है | ख़्वाबों के पुलिंदे ख्यालों में बदल एक सोच का रूप ले लेते है, दिल में कुछ ख्यालों को ले कर धारणा बन जाती है और दिल न चाहते हुए भी उन सब ख्यालों का साथ देने लगता है जोकि मुमकिन ही नहीं है | भई ! कल्पना-शक्ति की उड़ान ही कुछ ऐसी होती है जो हर किसी की चाहतों को पर लगा देती है, बादलों ऊंची छलांगे और कल्पनाओ के पुल हमारी सोच को उस यथाशक्ति से दूर ले जाते है और हमारे होसलों को ऊंची उड़ान देते है यद्दपि हम वही होते है समाज की सांसारिक सोच और रूढ़ीवादिता में अटके बेबस और लाचार पर जो होसलों के परिंदे स्वछन्द गगन में उड़ रहे होते है उन्हें रोक पाना बा-मुश्किल होता है |

आप यह सोच रहे होंगे कि आज यह सोच की बात कहाँ से आ गयी ? सोच और ख़्वाब कभी रास्ता पूछ नहीं आते, यह तो बस दिल को धीरे से छू, सपनों को ऊंची उड़ान दे जाते है और अगर शायद हम दिल की बातों पर कुछ अमल करे तो शायद उन हसीन सपनों को पंख दे सकते है जो दिल में कहीं कोनो में दबे पड़े है |

तो निकलिए अपनी सोच के दाएरे से बाहर, अपने सपनों के पंखो को आसमान दीजिये और उड़ चलिए अपनी कल्पना और सोच की नयी दुनिया में जहाँ सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश की जाती है | हर एक नयी सोच एक अच्छे आज और बेहतर कल को जन्म दे सकती है, परिवर्तन कर सकती है, आधार दे सकती है | तो आज सोचिये अपने बारे में, एक नयी सोच के साथ....

Thursday, July 28, 2011

आस्था, धर्म या अंधी भेड़चाल ???

आस्तिक और नास्तिक में बस एक धूमिल रेखा का ही फर्क होता है और वही एक रेखा इस पूरे संसार को दो भागो में बाटे हुए है | हालाकि आस्था का पलड़ा हमेशा से ही भारी रहा है है अपितु भौतिक सोच ने भी दुनिया का देखने का नजरिया बदला है | हम आस्तिक है इसके प्रमाण के लिए हम न जाने क्या-क्या करते है परन्तु हम भूल जाते है की आस्था श्रद्धा और निष्ठा से प्रतीक होती है न की दिखावे से | मंदिरों में बढ़ती भीड़ और चढ़ावा इस बात का प्रमाण है कि हम श्रद्धा में नहीं भेड़चाल में भागे चले जा रहे है | अगर हम पिछले कुछ दिनों के अख़बारों के पाने छाने तो इसके प्रतक्ष प्रमाण हमारे सामने है | मंदिरों में छुपे खजाने और बाबाओ के पास से मिलती धन-कुबेर राशियाँ, उस अंधी भेड़चाल का सबूत देती है जिसके चलते मंदिरों तक आस्था के व्यवसाय चलने लगे है | पंडितों, संतो और महान्तो की बढ़ती संपत्ति के बीच हम उन सुवर्ण-युगी संतो को भूलते जा रहे है जो दान-दक्षिणा पर जिया करते थे |

अभी हाल में ही मुझे गोवर्धन-पर्वत यात्रा का अवसर मिला | यह मेरा पहला अवसर था जिसमे मैं २१ किलोमीटर की अदभुत यात्रा पर पदल ही चल पड़ा हालाकि यह एक अनूठा एवम अदभुत अनुभव था परन्तु उसमे भी मुझे धर्म के नाम पर भागती अंधी भीड़ दिखाई देने लगी | लोगों की श्रद्धा लगता है ख़त्म सी हो गयी है, मानो श्रद्धा का सीधा संबंध शाररिक, मानसिक और व्यावसायिक संतुष्टि से ही रह गया है | पंडितों और महान्तो की भी श्रद्धा, आराधना व्यवसाय का रूप लेने लगी है | अब तो मंदिरों में तिलाकभिशेक भी १० रुपए के चढ़ावे के बाद होने लगे है और यदि आप दान-दक्षिणा नहीं करते है तो आप मोक्ष की भागीदार नहीं है...क्या हम इसी धर्म और कर्म-काण्ड की गुहार लगते फिरते है ? क्या यही हमारी आस्था रह गयी है या फिर हम भी उस भेड़चाल के मारे हो गए है ?

मैं यह नहीं कहता कि हम सभी इस अंधी भेड़चाल के शिकार है परन्तु हम में से अधिकतर लोग इसी झूटी श्रद्धा की तरफ क्रमबद्ध हो गए है | ज्यादा से ज्यादा चढ़ावा और दान-दक्षिणा आज-कल का फैशन बन गया है, लोग बस झूटी शान के लिए भागे जा रहे है और उस पत्थर रुपी भगवन में बसी आस्था को भूले जा रहे है जोकि वास्विकता में होनी चाहिए | मंदिरों में भी धीरे-धीरे आस्था और श्रद्धा का व्यवसाय बढ़ता चला जा रहा है और शायद कुछ समय पशचात सिर्फ ढोंग और दिखावा ही रह जायेगा |

तो अपनी आस्था का सौदा ऐसे न होने दे, आस्था और ढोंग के बीच के फर्क को पहचाने और दिखावे से बचे | उन कर्म-कांडों से बचे जो हम अब तक खुद की जिद्द से या फिर किसी के दबाव में करते आ रहे है | भगवन यह नहीं कहते कि मुझे रोज़ पूजो अपितु जब भी पूजो बस दिल से पूजो | तो चलिए, अपनी सच्ची श्रद्धा की ओर न की ढोंग की ओर... |

Tuesday, June 21, 2011

अंतर्द्वंद...

अंतर्द्वंद...एक ऐसी परिस्थिति और कमोपेश है जिसमे हम उन कड़वे सच का सामना करते है जिसे हम जानते हुए भी आँख मूँद लेते है | अंतर्द्वंद की परिभाषा कुछ भी हो सकती है परन्तु यह सत्य है कि एक पसोपेश सा बना रहता है खुद के सवालों और जवाबों के बीच में, एक असमंजस बना रहता है अर्थ और निरर्थ के बीच, उन सवालों के बीच जिसका उत्तर जानते हुए भी हम सुनना या मानना नहीं चाहते है | अंतर्द्वंद की स्थिति बिलकुल उस समकालीन युद्ध की तरह होती है जिसमे दोनों तरफ से ज़ख्म खुद को ही मिलने होते है | 

अंतर्द्वंद की परिस्थिति तब बनती है जब हमारे ज़ेहन में अनसुलझे सवालों का पुलिंदा बन जाता है, उन सच्चाईयों को दिल मानने पर मजबूर हो जाता है जिसे वो मानना नहीं चाहता | अंतर्द्वंद की कोई परिभाषा नहीं होती, अगर होती तो शायद उसे बताने के मुझे ज्यादा आसानी होती | उस विषय को कैसे समझाया जाए जो खुद में एक अनसुलझा सवाल है | एक गहन चिंतन की परिस्थिति बनी रहती है, दिल में बहुत सारे सवाल उठते है परन्तु उनके जवाब देने के लिए कोई पास नहीं होता | एक कशमकश सा बना रहता है, दिल के अन्दर न जाने कितनी आवाज़े बनती और बिगड़ती रहती है, दिल खुद से ही सवाल पूछता रहता है और जवाब जानते हुए भी दिल उसे मानना नहीं चाहता | 

मैं इस अंतर्द्वंद की परिस्थिति में खुद के सवालों के जवाब ढूँढता हूँ, कई अनसुलझे पहलुओ को सुलझाने की कोशिश करता हूँ | इस स्थिति में वेग और आवेश काम नहीं करते क्यूंकि अंतर्द्वंद की स्थिति उन्ही लोगों की यादों के लेकर उत्पन्न होती है जिन्हें हम खोना नहीं चाहते, उन्ही यादों के लिए एक प्रश्नोत्तर की क्रमवावली बनाती है जो दूरियों में दूर हो गए है परन्तु दिल के आज भी नज़दीक है | मुझे ऐसी परिस्थिति में उन लम्हों से रूबरू होने का मौका मिलता है जिन्हें मैं भूलता जा रहा हूँ, उन यादों से हमसफ़र होने का ज़रिया मिलता है जिन्हें कहीं पीछे राहों में छोड़ चला हूँ, उन रिश्तों के मुलाकात का मौका मिलता है जो आज भी दिल के उतने ही अजीज़ है जितने वो कल थे | 

तो चाहिए! समझिये अपने अन्दर चलते उस अंतर्द्वंद को जिसके बीच में आप उन रिश्ते, यादों, लम्हों को खोता देख रहे है जिन्हें आप खोना नहीं चाहते और बढ़िये उस हसीन सुख की ओर जिसे आप कहीं पीछे छोड़ चले है उन अधूरी यादों की तरह जो दिल-अजीज़ है |

सधन्यवाद!!!

Tuesday, June 14, 2011

ऑटो नंबर - DL-1RK 3157

दिल्ली दिलवालों की!!
भारत के कोनो-कोनो से आ कर बसाने वाले लोगो से मिलकर बनी ये दिल्ली सभी का खुले दिल से स्वागत करती है | यहाँ रहनेवाला कहीं उत्तर प्रदेश से तो फिर कहीं बिहार से, कहीं केरल से है तो कहीं सिक्किम या नागालैंड से और यह सभी लोग मिलकर बनाते है "दिल्ली" | देश की राजधानी होने के साथ-साथ, राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र दिल्ली फिर भी दिल्ली ही है | पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में, पंजाबी तड़के की खुशबूं के बीच महकती दिल्ली | दिल्ली की धड़कन मेट्रो और लो-फ्लोर बसों के बीच बसी दिल्ली अपने ही रंग का जलवा बिखेरती रहती है | देश का केंद्र होने के नाते चर्चाओ और सुर्ख़ियों में बसी दिल्ली सभी के लिए एक सी रहती है और इन्ही में कहीं बसे हुए है दिल्ली के ऑटो वाले | 

दिल्ली की आधी जान संभाले यह ऑटो वाले, दिल्ली के इस कोने से उस कोनो तक लोगो की अवाह्जाही का साधन तो बनते है परन्तु कभी-कभी अपनी कुटिल व कपिट व्यवहार से लोगों की परेशानी का सबब भी बन जाते है | सवारियों से जबरन पैसे ऐठना या मीटर से न चलना तो माने उनका जन्मसिद्ध अधिकार है परन्तु इस मनमानी में राहगीरों को जो नुक्सान पहुंचा देते है, उसका मुझे बड़ा दुःख होता है यदपि मुझसे कभी किसी ऑटो वाले ने बेमानी नहीं की पर फिर भी हर रोज़ एक नयी घटना सुनने को मिल ही जाती है | हालाकि सभी ऑटो वाले गलत नहीं होते, उसी तरह जैसे एक तालाब की सारी मछलिया गन्दी नहीं होती परन्तु कुछ गन्दी मछलियों की वजह से बाकी मछलियों को भी गंदिगी का शिकार होना पड़ता है और ऐसी ही गन्दी मछलियों के बीच में से कुछ अच्छी मछलियाँ इस कोशिश में लगी रहती है कि यह गन्दी से भरा तालाब थोडा साफ़ हो जाये | ऐसे ही मछलियों में से एक मछली से आज मेरी मुलाकात हुई |

बस की प्रतीक्षा में खड़े, गर्मी और लू के थपेड़ों को सहते हुए मैं और मेरे मित्र ने एक ऑटो वाले को हाँथ दिया | उस अधेड़ उम्र के ऑटो ड्राईवर ने मीटर डाउन करते हुए पुछा "कहाँ जायेंगे साहब?", अपने कार्यालय का पता बताते हुए न जाने क्यूँ मैंने उनसे गुफ्तगू शुरू कर दी | वो कहते है न शब्दों के तो पर लगे होते है और बातें तो बातों में से निकलती चली जाती है | इस आधे घंटे के छोटे से सफ़र में बातों के पड़ाव दर पड़ाव चलते रहे और उसी दोरान मुझे कुछ पलों के लिए ऑटो वालों की ज़िन्दगी से रूबरू होने का मौका मिला | 

लगभग 40 - 45 के अशोक सिंह जी ऑटो चलने के साथ-साथ 3 बच्चों के पिता है | ऑटो-चालक होने के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और ईमानदारी का ज्ञान दिया है | अपने बच्चों को MBA और शिक्षिका के पद पर देख शायद वह फूले नहीं समाते होंगे और जाने-अनजाने उन्होंने मुझे भी ईमानदारी का पाठ पढ़ाया | उनके पुराने किस्सों में कई बार अपने ईमानदारी का विवरण दिया | आज सुबह के ही एक ताज़े किस्से में उन्होंने एक सवारी को ईमानदारी का ज्ञान देते हुए कहा की "मैडम जी, अगर मैं यह पैसे रख भी लूँगा तो यह पैसे मुझे पचेंगे नहीं, कहीं न कहीं यह बेमानी का पैसा निकल ही जायेगा" | यदपि अगर वो चाहते तो वो 400 रुपये रख सकते थे और उस औरत (सवारी) को दिए बिना ही जा सकते थे परन्तु फिर भी उन्होंने उससे उसके हिसाब के पैसे वापस कर मुझे उस ज्ञान का पाठ कराया जिससे शायद मैं भूलता जा रहा था अपितु आज के इस मतलबखोर वक़्त में हम ईमानदारी का पाठ भूलते जा रहे है और कभी-कभी तो बेमानी करने में भी गुरेज़ नहीं करते |

मैं अशोक जी जैसे उन तमाम लोगों को शुक्रगुज़ार हूँ जो जाने-अनजाने में मुझे उस अगूड़ ज्ञान से भरे सागर में ले जाते है और मुझे रूबरू होने देते है उन जाने-पहचाने सच से जो मैं शायद वक़्त की इस तेज़ रफ़्तार में भूलता जा रहा हूँ, उस ज्ञान का पाठ कराते है जिससे जानते-पहचानते भी मैं अनदेखा कर देता हूँ और उनकी इन्ही वजह और कोशिशों से मुझे कुछ और लफ़्ज़ों से खेलने का मौका मिल जाता है जिसके लिए तह-दिल से शुक्रिया |

सधन्यवाद !!!

Monday, June 13, 2011

प्रेम, प्यार, स्नेह...क्यूँ कुछ शब्द अधूरे से !!

आज के इस क्रियाकाल्पिक युग में लोग मानो अंधे से होते जा रहे है | सभी एक अंधी भेड़-चाल में नाक की सीध में किसी अनजाने सुख के पीछे भागे चले जा रहे है | ऐसा लगता है मानो वो वो नहीं कोई और बन कर जी रहे हो परन्तु सत्य तो यह है कि इस आधुनिकरण युग में इंसान भी मशीन की तरह ही होता चला जा रहा है | उसके अंदर का सारा प्यार, स्नेह, प्रेम, मोहोब्बत सब मरते से चले जा रहे है | मुझे कभी-कभी लगता है कि क्या इंसान सच में अपनी ज़िन्दगी से निराश और हताश है या फिर उसके अन्दर का वो मोम-मानव मर गया है जो कभी उसके दिल में जिंदा हुआ करता था? मैंने यह जानने के लिए कई चेहरों का अध्धयन किया जो कि आज कल मुझे बेहद प्रिय सा कार्य लगने लगा है | लोगो के चेहरों के अध्धयन से मुझे अपने अन्दर आकस्मित आने वाली त्रुटियों का एहसास होने लगा जिसका शायद मैं सुधार कर सकता हूँ | मुझे लोगो के चेहरों पर चढ़े झूठे नकाबों को पढ़ने की कला मिली जिससे मैंने तो छल-कपट से बचना सीख लिया परन्तु अभी भी लगता है कि यह ज्ञान अधूरा है | 

ख़ैर छोड़िये! आज लोगो के दिलों में फासले बढ़ने लगे है, हर रिश्ता धीरे-धीरे नापाक सा होता जा रहा है | कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मानो कृष्ण के मुखारविंद से निकली गीता के शब्द मानो सत्य में परिवर्तित होते जा रहे हो, "तुम अकेले ही आये थे और अकेले ही जाओगे" परन्तु लोगो ने शायद इससे गलत चरितार्थ कर लिया है | हर रिश्ता धीरे-धीरे बेजान होता जा रहा है, लोगो में प्यार और स्नेह कम होता जा रहा है | हर रिश्ते में खटास पड़ती जा रही है और कोई भी आगे बढ़ इस बढ़ती खायी को पाटने की कोशिश नहीं करता क्यूंकि अहम् आत्मसम्मान की जगह ले लेता है और फिर धीरे-धीरे रिश्तों के कच्चे धागे टूटने लगते है | 

"बद से बदतर होता जा रहा इंसान, अपना अक्स खोता जा रहा इंसान,
जुर्म और खून से सराबोर होती जा रही, एक-एक रग,
जुर्म और काल की, काली कूप में बढते उसके पग,
न माँ, न बाप, न बहन, न भाई अपना,
बस पैसे की भूख, और खून का सपना जीता जा रहा इंसान,
हर रिश्ते को शर्म-सार करता जा रहा इंसान,
बुराई के पथ पर बढता जा रहा इंसान...

देख इस दुर्दशा को, दिल मेरा भी जोर रोया,
पर सुधार की गुंजाईश न देख, दर्द अपना दिल में खोया,
बन के पथिक, भटकता रहा दर-ब-दर,
मातम भी न मना सका, ऐसे ये बे-जोर रोया..."

यह कुछ अधूरी पंग्तिया शायद उस अगूड़ सत्य को बयान करती है जो शायद धीरे-धीरे लोभ और लालच में डूबा इंसान भूलता जा रहा है | हर रोज़ एक नयी खबर में एक नए रिश्ते को नापाक होते देखने के आदि हो गए है हम, कहीं भाई भाई के खून का प्यासा है तो कहीं बहन भाई की हवास का शिकार हो रही है, कोई माँ अपने बच्चो को बेच दे रही है तो कहीं बाप बेटी का गला दबाने को तैयार है | ऐसा लगता है कि मानो कोई किसी का सगा है ही नहीं दुनिया में, सब बस अपने लोभ और लालच कि हवास को अग्नि दिए जा रहे है | कभी-कभी तो मुझे अपने मनुष्य होने पर भी घिन्न आने लगती है | क्या सोचा होगा उसने तराशते वक़्त कि आगे चल कर उसका यह नायाब करिश्मा अपने ही रिश्तो को शर्मसार करेगा? क्या अपने ही रिश्तों से खून कि होलिया खेलेगा?

मेरे लफ़्ज़ों में शायद चुभन होगी या फिर मेरा ज़मीर अभी भी जिंदा है स्नेह और अपनेपन के साथ जो आज भी मुझे लोगो से बड़े स्नेह और आत्मीयता से मिलाता है जैसे मानो मेरे अपने ही हो क्यूंकि मैंने यह सीखा है कि द्वेष दिल में रखने से ज़हर ही बनता है, अमृत नहीं | तो चलिए, उठिए और दोनों हाँथ फैला कर खुले दिल से हर उस शक्श का स्वागत कीजिये जो भी आपके आस-पास है | उठिए और सबकी जिंदगी में भर दीजिये स्नेह, प्यार और अपनेपन का रंग और फिर देखिये ज़िन्दगी कितनी हसीन है |  

धन्यवाद!!!

Monday, June 6, 2011

भ्रष्टाचार के लिए यह शिष्टाचार क्यूँ...?

हम सभी भ्रष्ट है परन्तु फिर भी हम चाहते है कि भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो | कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता है कि मानो इस देश में बिना भ्रष्टाचार के एक दिन गुज़ार पाना भी मुश्किल होगा | हर तरफ घूसखोरी, जालसाजी और भ्रष्टाचार फैला हुआ है और हम निठल्लो की तरह हाँथ पर हाँथ रख बैठे इस भ्रष्टाचार को बढ़ते देख रहे है | हम बस लोगो की आवाज़ में आवाज़ मिला सकते है परन्तु अकेले शुरुआत करने में हम डरपोक बन जाते है | मैं सिर्फ आपकी बात नहीं कर रहा, हम सभी की बात कर रहा हूँ क्यूंकि कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार है इस भ्रष्टाचार को बढ़ाने में | तो अगर आज हमारे नेताओ का कला धन स्विस बैंक में जमा है तो फिर क्यूँ हम भ्रष्टाचार की बात करते है? फिर क्यूँ हम एक दुसरे को चोर-लुटेरे बोलते रहते है? क्यूँ हम अपने जुर्म दूसरों के सिर मढ़ते रहते है? 

हर सुबह के अखबार में एक नए "अनशन" की बात होती है, कभी किसी गली, गाँव, कसबे, नगर, जिले में तो कभी बड़े शहरों में तो कभी हर गली, कोने, नुक्कड़ पर अनशन की बाते हो रही होती है | कभी-कभी तो मुझे लगता है कि इस देश का नाम भारत से "अनशन-इंडिया" कर देना चाहिए ताकि बाहर वाले भी जाने कि हम भी चर्चो में है |

अन्ना हजारे के अनशन के बाद, बाबा रामदेव ने इसकी बागडोर थाम ली और अपने चेले-चपाटों (भक्तगण) के साथ अनशन पर बैठ गए | उनके कड़े प्रयास के बाद भी उन्हें उठा कर हरिद्वार भेज दिया परन्तु इस साहसिक (सोनिया गाँधी सरकार कि आवाज़ में) कार्य के चक्कर में हज़ारों भक्तजनों को भुगतान करना पड़ा | यह सरकारी मुलाज़िमो को इस लिए भी करना पड़ा ताकि उनकी गद्दी बची रहे क्यूंकि कहीं न कहीं उनके मन में डर था कि कहीं बाबा भी अन्ना हजारे की तरह कुछ न कर जाये | कहीं अन्ना की तरह कुछ बेकार की मांगे न रख दे और इस बार तो मुद्दा भी कड़ा है और जनता भी |

सवाल था बाबा से कैसे निपटा जाये? और सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया कि सब कुछ छिन-भिन हो गया | धारा 144 के तहत पुलिस ने बाबा का समर्थन करने वाले लोगो की जमकर तुड़ाई की, भीड़ को काबू करने के लिए आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल से भी पुलिस पीछे नहीं हटी और बाबा को मुह छुपा कर हरिद्वार भागना पड़ा | परन्तु, क्या ऐसा करने से भ्रष्टाचार का यह मुद्दा थम जायेगा? क्या जनता उस सच से अछूती रह जाएगी जो स्विस बैंको में जमा है? या फिर उस सच से अछूती रह जाएगी कि हम सब भ्रष्टाचार में यहाँ तक लिप्त हो चुके है कि एक वक़्त आने पर हम अपने आप को भ्रष्टाचार कि आग में भस्म कर लेंगे? 

ख़ैर छोड़िये, हम सब जानते है कि हम कितने पानी में है और मैं यह भी मानता हूँ कि इस भ्रष्टाचार का अंत होने में एक लम्बा अरसा लगेगा परन्तु हमे हार नहीं माननी चाहिए | मैं अभी भी एक अच्छे-सच्चे भारत को कहीं दूर कोनो में देख सकता हूँ और उम्मीद भी करता हूँ कि एक दिन वही सचाई का सूर्य उदय होगा बिना भ्रष्टाचार के... | 

सधन्यवाद !!!