Thursday, July 11, 2013

घरौंदे का पंछी...

मैं बहुत उधेड़बुन में था कि कैसे बयान करूँ उस लड़की की हकीक़त जिसने अभी दुनिया देखनी शुरू की हो, मेहनत शुरू की हो, अपने लिए सोचना और समझना शुरू किया हो । बड़ी बेचैन थी मेरी सांसें जो अन्दर से कचोट रही थी कि कुछ कहो, ऐसे कब तक चुप बैठोगे । सवाल कठिन जरूर था पर जवाब तो देना ही था...

छोटी-छोटी इच्छाओं का घरौंदा बांधे उसने चलना शुरू किया, कुछ पंख लिए और अपने घोसले से बाहर की तरफ झाँका, कोई था नहीं सँभालने को पर फिर भी दूर उड़ते हुए साथियों को देख हौसले बुलंद किये और कूद उठी ज़िन्दगी के मैदान में । उड़ते हुए उसने पंख हासिल किये और ज़िन्दगी के असली सफ़र की तरफ उड़ना शुरू किया पर ये क्या? शिकारी ने पंख काटने के इरादे से उससे घोसले में बुलाया, शिकारी अपना था, मालूम था नुक्सान नहीं करेगा इसलिए चलने की ठानी!

उलझन बहुत थी मन में, क्या करे, कैसे बचे ज़िन्दगी के भवर से, कैसे समझाए कि नहीं तैयार वो पिंजरों में रहने के लिए, कैसे समझाए की अभी और आस्मां जीतने है, उड़ना है, दुनिया देखनी है, कैसे बतलाये की जो तुमने सोचा है मैं उसके लिए तैयार नहीं । पर वो न नहीं कह सकती थी, कैसे कहती कोई हस्ती नहीं थी और किस से कहती वो जो अपना है? मन-मंथन में उड़ते-उड़ते टकरा बैठी साथ के एक परिंदे से, परिंदा था छोटा परन्तु तेज़ था, देखते है दुविधा भाप गया और वो चिड़िया भी अपने मन का बोझ नहीं सह सकी, रो पड़ी और कह दी आप बीती । परिंदे ने समझाया, बुझाया, हंसाया थोड़ा रुलाया भी और अपने लिए लड़ना सिखाया, कि एक दिन तुम्हे खुद अपने लिए खड़ा होना पड़ेगा और ये सोचो की वो वक़्त आज है, इसलिए अपने लिए खड़े हो, लड़ो और हथियार मत डालो ।

और चिड़िया बोली "क्या मैं उड़ नहीं सकती जैसे मैं उड़ना चाहती हूँ?"

क्या बस यह एक सवाल था?

Wednesday, September 19, 2012

झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं...

झूठ या फिर एक सफ़ेद सच दिल बहलाने के लिए की इंसान सच सुनने के काबिल नहीं । वो सुनना वही चाहता है जो उसके दिल को सुकून दे, उसकी अंतर-आत्मा को शिथिल न करे परन्तु फिर भी कहीं न कहीं एक जिज्ञासा होती है वो अनचाहा सच जानने की जो हमारे दिल को पीड़ा और ग्लानि से भर दे और अंतर-मन को टटोले और पूछे कि क्या इसी सच की तलाश थी हमें?

ऐसी व्यथा-स्तिथि में मुझे पिताजी की एक पंगती खूब सटीक लगती है "कितना मुश्किल है किसी यंत्रणा में जीना और जीते चले जाना खुद के स्वाह होने तक"। अपितु हम जानते है कि ऐसी स्तिथि में मनोभाव कैसे होते है परन्तु फिर भी हम मीठे झूठ को पचा उस कड़वे सच से दूर भागते रहते है जो गाहे-बगाहे हमारी आँखों के सामने घूमता रहता है ।

झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं,
जान लो जो बात को, जिज्ञासा का कोई अंत नहीं,
आँख मूंदे, बाहें मोड़े, बैठे कब तक रहोगे,
आँख खोलो, सच को देखो, ऐसे कब तक रहोगे,
झूठ बोले हो पतन जो, राख आज कर दो मुझे,
ग्लानि भर जब आँख फेरों , भस्म तुम कर दो मुझे,
डोर जो हो कच्चे-धागे, बाँध लो हर कर मुझे,
मन बड़ा विचलित है मेरा, ध्यान भंग कर दो मुझे,
जान को जो बात को, जिज्ञासा का कोई अंत नहीं,
झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं ।

मैंने अपने छोटे-छोटे अनुभवों से सिखा है कि कितना मुश्किल है सच कहना झूठ के सामने, हम झूठ बड़ी आसानी से बोल लेते है परन्तु यह भी याद रखिये सच बोलने पर आपको यह याद रखने की जरूरत नहीं कि आपने सामने वाले को क्या बोला था । सच कड़वा जरूर है परन्तु सच, सच है । बहुत छोटा सा फासला है सच और झूठ के दरमियान पर झूठ बोलने से पहले एक बार सोचिये क्या आप झूठ बोल कर अपने प्रियजन के कोमल मन को ठेस तो नहीं पहुंचा रहे? 

हम सभी ने छोटे-छोटे झूठ बोल कर बहुत कुछ खोया है परन्तु मैं आशा करता हूँ कि अब हम गलतियाँ दोहरा कर खुद को ग्लानि का पात्र नहीं बनायेंगे क्यूंकि "झूठ का कोई अंत नहीं, सच का कोई मंत्र नहीं " ।  

Sunday, November 27, 2011

"मैं" अहेम या बगावत...

जल रहा हूँ अंगारों सा क्यूँ मैं, सांस लेना भी दुश्वार है,
जलकर राख भी नहीं होता यह जिस्म, जाने क्यूँ जीने की प्यास है,
अरमानों का क़त्ल रोज़ करता हूँ, तिल-तिल करके रोज़ मरता हूँ,
फिर भी ज़िन्दगी क्यूँ, यूँ मुझ पर मेहरबान है,
हर दम, एक अजब सी आग, जो घुटन बनने लगी है साँसों में,
मैं जानता हूँ, गल रहा है मेरा अहेम, फिर भी अहंकार की प्यास है,
झुंझलाहट, चिल्लाहट, जो दबी पड़ी थी, मेरे खून के कतरों में,
क्यूँ उबाल सी बन, बरसने लगी है मेरे लफ़्ज़ों में कहीं,
जुल्म और सितम, अब क्यूँ गवारा नहीं,
झूठ के बिना, क्यूँ सभी बेसहारा यहीं,
अरमानों का क़त्ल रोज़ करता हूँ, तिल-तिल कर रोज़ मरता हूँ,
फिर भी ज़िन्दगी क्यूँ, यूँ मुझ पर मेहरबान है,
जल रहा हूँ अंगारों सा, क्यूँ सांस लेना भी दुश्वार है,
जलकर राख भी नहीं होता जिस्म, जाने क्यूँ इसे जीने की प्यास है...

एक आग की तपिश सी महसूस होती है अन्दर, जो उबाल बन रगों में दौड़ने लगी है परन्तु मैं यह नहीं जानता की यह आग अहेम की है या बगावत की ? जानता हूँ इस आग से गलने लगा है मेरा शरीर परन्तु फिर भी इसे संभाले हुए चल रहा हूँ और अपने ही अहेम में कहीं जल रहा हूँ ।

खुद अपने ही लफ्ज़ अजनबी से लगने लगते है, तो कभी मेरे अन्दर गलते-मरते "मैं" को सहारा देते है परन्तु मैं यह नहीं जानता की यह सही है या गलत । हम इस छोटी सी ज़िन्दगी में कई किरदार निभाते है परन्तु अपने कर्त्तव्य को निभाते-निभाते हम अपने अन्दर के "मैं" को भूल जाते है । पर वो नहीं भूलता, वो पलता रहता है अन्दर-अन्दर, जलता रहता है और एक दिन खुद अपने आप को भस्म कर लेता है, अंत कर देता है खुद की ही वक्तित्व का या फिर कभी रौद्र रूप धारण कर सृष्टि-संघार कर देता है । 

तो जानिये अपने अन्दर के उन्ही सवालों को और पूछिए खुद से सवाल की क्या आप अपने लिए जी रहे है? उठाइए उन सवालों का पुलिंदा और खोजिये अपने "मैं" को!!!

Monday, November 21, 2011

रिश्तों की कच्ची डोर...

रिश्ता शब्द अपने आप में पूरी परिभाषा लिए हुए है परन्तु रिश्तों की अहेम पहचान उन कच्चे पलों में होती है जब इंसान को अपने सगे-साथियों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है | अपितु, वही एक पल ऐसा भी होता है जिसमे आपको अच्छे और बुरे दोनों रिश्तों की पहचान हो जाती है | हालांकि, रिश्ते परिभाषा से नहीं, विश्वास से बनते है, कहने को रिश्तों की परिभाषा विश्वास के कच्चे धागे से शुरू हो एक अनचाहे प्रेमसंबंध पर ख़त्म होती है जिसको लफ़्ज़ों में बयान करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है |

मुझे याद है, रिश्तों की परख सीखते हुए मुझे एक अनजाने शख्स ने यह सीख दी कि रिश्ते रेत की तरह होते है उन्हें मुठ्ठी में जितना कसकर बाँधने की कोशिश करोगे वो उतनी ही तेज़ी से हाँथ से फिसलते चले जायेंगे और एक वक़्त ऐसा भी आएगा की आपके हाँथ में अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा | हालांकि बाद में उनके दिए कटु-अनुभवों से मैंने सीखा की रिश्तों की सही पहचान कैसे की जाए |


आप सोच रहे होंगे की आज मैं अचानक रिश्तों की बात लेकर कैसे बैठ गया, वो कहते है न चोट लगने पर ही दर्द का सही एहसास होता है | हम सभी की ज़िन्दगी में कभी न कभी रिश्तों की परीक्षा की घड़ी जरूर आती है और जब सदियों पुराने रिश्ते टूटते है तो मन आप-व्यथा बताने की स्तिथि में नहीं होता, किसी अपने को खो देने वाले दर्द का ज्वर दिल में चढ़ता-उतरता रहता है और इसी मनोस्तिथि में हम रिश्तों की उन मीठी बातों को भोल जाते है जो शायद मेरे हिसाब से सबसे अहेम होती है क्यूंकि दुःख के पल तो रो कर भुलाए जा सकते है परन्तु ख़ुशी के पलों में हँसी को भूल जाना बेवकूफी है |


पर अहेम सवाल यह है कि रिश्तों में दरार क्यूँ आती है ?
हम अपने अहम्, ईर्ष्या और द्वेष की भावनाओं में बहते हुए यह भूल जाते है कि इस रिश्ते के न होने से ज़िन्दगी में कैसा बदलाव आएगा | हम विष-वचन तो याद रख लेते है परन्तु उन मधु-वचनों को भूल जाते है जो कभी उस अनजाने रिश्ते की जान थे, पहचान थे | और शायद इसी मनोस्तिथि में पड़ कर हम उन रिश्तों का त्याग कर देते है जो कभी ज़िन्दगी हुआ करते थे, उन रिश्तों को भूल जाते है जिसमे कभी सारी दुनिया समां जाती थी, उन रिश्तों को महसूस करना छोड़ देते है जो कभी धडकनों की तरह सुनाई देते थे |

तो उठिए और फिर से उन रिश्तों की टूटती डोर को थाम लीजिये जो जाने अनजाने में धीरे-धीरे हाँथ से छूटती जा रही है, बताएये उन रिश्तों को अपने दिल की परिभाषा जो सच में दिल को अजीज़ है और महसूस कीजिये एक स्वछंद नयापन अपने रिश्तों में...

Tuesday, November 15, 2011

कलम व्यथा...

कलम उठा यूँ लिखने बैठा, जाने किस-किस सोच में,
क्या लिखूं, क्या न लिखूं, के ताने-बाने में बुन कर रह गया,
हाल-इ-हसरत, कलम-इ-जुर्रत, लफ़्ज़ों में क्यूँ घुल गया,
क्या लिखूं, क्या न लिखूं, के ताने-बाने में बुन कर रह गया...

लफ़्ज़ों की दुनिया बहुत ही अजीब होती है, एक छोटी सी पंगति से राजा को रंक और रंक को राजा बना देती है | आज दुनिया ने कलम की शक्ति को तो पहचाना है परन्तु हम कभी-कभी उसके दुष्परिणामों को भूल जाते है | अपितु, लिखने के अभ्यास से यह तो साफ़ है कि आपके पास दिन प्रतिदिन शब्दों का शब्दकोष बढ़ता जाता है और साथ ही साथ बोलने और लिखने कि कला में भी निखार होता है |

आप सोच रहे होंगे कि आज अचानक मैं लिखने के मर्म को लेकर क्यूँ बैठ गया | हुआ यूँ, कि कुछ दिनों पहले अपने अहम् पर प्रश्नचिन्ह लगाते कुछ सवाल मेरे सामने आ खड़े हुए और यह सत्य है कि जब इंसान के अहम् के ऊपर बात आती है तभी मनोस्तिथि में सजगता भी आती है | खैर, सवाल था कि लिखने से किसी को क्या मिलता है ? मेरे लिए यह सवाल बड़ा ही रोचक था क्यूंकि इस प्रश्न का उत्तर तो मैं खुद भी खोज रहा था और रहा हूँ, हालांकि अभी भी कुछ यथाचित उत्तर तो नहीं है मेरे पास परन्तु एक अनायास ख़ुशी है जो शायद मुझे लिखने के बाद आती है | इस स्तिथि का आभास होते ही मैंने अचानक मिलने वाली खुशियों का कारण खोजना शुरू कर दिया और एक रात अचानक ही ख़ुशी का एक अजीब एहसास हुआ | यह एहसास अछूता नहीं था मुझसे क्यूंकि यह मेरा अपना एहसास था जो मुझे शायद लिखने पर मिलता है | वो कहते है न:


लिखत-लिखत कलम घिसे, गहरी होत दवात,
मन तरसे नए शब्दों को, बुझे न लिखन की प्यास,
कह अभिनव, नव-नूतन बनके, लिख दो दिल की आस,
मन तरसे नए शब्दों को, बुझे न लिखन की प्यास...

इंसान ख़ुशी के लिए ही इतनी जद्दोजहत करता है, अगर ख़ुशी का कोई ठिकाना ही न हो तो इंसान के परिश्रम का क्या फ़ायदा और मेरे हिसाब से कार्य वही करना चाहिए जिसमे ख़ुशी मिले | तो, मैंने तो अपनी ख़ुशी का स्त्रोत खोज लिया, आप क्या सोच रहे है... 

Monday, August 15, 2011

एक सोच...

सोच ! शायद इसकी शुरुआत उस मनोस्तिथि से होती है जिसमे आपके ज़ेहन में ख्यालों के काफिले तो चल रहे होते है अपितु उन्हें रोक और पूछ पाना बहुत ही मुश्किल होता है | ख्यालों के सिलसिले-ब-सिलसिले चलते हुए एक सोच पर अटक कर रह जाते है, एक अच्छी सोच !!! सोच का कोई दाएरा, कोई सीमा नहीं होती अपितु सोच तो बस बहती हवा की तरह होती है, स्वछंद एवं स्वतंत्र | 

सोच कभी बुरी नहीं होती यद्दपि सोचने वाला दिल या दिमाग अच्छा या बुरा होता है | हम किसी व्यक्ति-वेशेष को उसकी अच्छी या बुरी सोच के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते अपितु यह उसकी अच्छी और बुरी परिस्तिथियों पर निर्भर करता है | ख़्वाबों के पुलिंदे ख्यालों में बदल एक सोच का रूप ले लेते है, दिल में कुछ ख्यालों को ले कर धारणा बन जाती है और दिल न चाहते हुए भी उन सब ख्यालों का साथ देने लगता है जोकि मुमकिन ही नहीं है | भई ! कल्पना-शक्ति की उड़ान ही कुछ ऐसी होती है जो हर किसी की चाहतों को पर लगा देती है, बादलों ऊंची छलांगे और कल्पनाओ के पुल हमारी सोच को उस यथाशक्ति से दूर ले जाते है और हमारे होसलों को ऊंची उड़ान देते है यद्दपि हम वही होते है समाज की सांसारिक सोच और रूढ़ीवादिता में अटके बेबस और लाचार पर जो होसलों के परिंदे स्वछन्द गगन में उड़ रहे होते है उन्हें रोक पाना बा-मुश्किल होता है |

आप यह सोच रहे होंगे कि आज यह सोच की बात कहाँ से आ गयी ? सोच और ख़्वाब कभी रास्ता पूछ नहीं आते, यह तो बस दिल को धीरे से छू, सपनों को ऊंची उड़ान दे जाते है और अगर शायद हम दिल की बातों पर कुछ अमल करे तो शायद उन हसीन सपनों को पंख दे सकते है जो दिल में कहीं कोनो में दबे पड़े है |

तो निकलिए अपनी सोच के दाएरे से बाहर, अपने सपनों के पंखो को आसमान दीजिये और उड़ चलिए अपनी कल्पना और सोच की नयी दुनिया में जहाँ सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश की जाती है | हर एक नयी सोच एक अच्छे आज और बेहतर कल को जन्म दे सकती है, परिवर्तन कर सकती है, आधार दे सकती है | तो आज सोचिये अपने बारे में, एक नयी सोच के साथ....

Thursday, July 28, 2011

आस्था, धर्म या अंधी भेड़चाल ???

आस्तिक और नास्तिक में बस एक धूमिल रेखा का ही फर्क होता है और वही एक रेखा इस पूरे संसार को दो भागो में बाटे हुए है | हालाकि आस्था का पलड़ा हमेशा से ही भारी रहा है है अपितु भौतिक सोच ने भी दुनिया का देखने का नजरिया बदला है | हम आस्तिक है इसके प्रमाण के लिए हम न जाने क्या-क्या करते है परन्तु हम भूल जाते है की आस्था श्रद्धा और निष्ठा से प्रतीक होती है न की दिखावे से | मंदिरों में बढ़ती भीड़ और चढ़ावा इस बात का प्रमाण है कि हम श्रद्धा में नहीं भेड़चाल में भागे चले जा रहे है | अगर हम पिछले कुछ दिनों के अख़बारों के पाने छाने तो इसके प्रतक्ष प्रमाण हमारे सामने है | मंदिरों में छुपे खजाने और बाबाओ के पास से मिलती धन-कुबेर राशियाँ, उस अंधी भेड़चाल का सबूत देती है जिसके चलते मंदिरों तक आस्था के व्यवसाय चलने लगे है | पंडितों, संतो और महान्तो की बढ़ती संपत्ति के बीच हम उन सुवर्ण-युगी संतो को भूलते जा रहे है जो दान-दक्षिणा पर जिया करते थे |

अभी हाल में ही मुझे गोवर्धन-पर्वत यात्रा का अवसर मिला | यह मेरा पहला अवसर था जिसमे मैं २१ किलोमीटर की अदभुत यात्रा पर पदल ही चल पड़ा हालाकि यह एक अनूठा एवम अदभुत अनुभव था परन्तु उसमे भी मुझे धर्म के नाम पर भागती अंधी भीड़ दिखाई देने लगी | लोगों की श्रद्धा लगता है ख़त्म सी हो गयी है, मानो श्रद्धा का सीधा संबंध शाररिक, मानसिक और व्यावसायिक संतुष्टि से ही रह गया है | पंडितों और महान्तो की भी श्रद्धा, आराधना व्यवसाय का रूप लेने लगी है | अब तो मंदिरों में तिलाकभिशेक भी १० रुपए के चढ़ावे के बाद होने लगे है और यदि आप दान-दक्षिणा नहीं करते है तो आप मोक्ष की भागीदार नहीं है...क्या हम इसी धर्म और कर्म-काण्ड की गुहार लगते फिरते है ? क्या यही हमारी आस्था रह गयी है या फिर हम भी उस भेड़चाल के मारे हो गए है ?

मैं यह नहीं कहता कि हम सभी इस अंधी भेड़चाल के शिकार है परन्तु हम में से अधिकतर लोग इसी झूटी श्रद्धा की तरफ क्रमबद्ध हो गए है | ज्यादा से ज्यादा चढ़ावा और दान-दक्षिणा आज-कल का फैशन बन गया है, लोग बस झूटी शान के लिए भागे जा रहे है और उस पत्थर रुपी भगवन में बसी आस्था को भूले जा रहे है जोकि वास्विकता में होनी चाहिए | मंदिरों में भी धीरे-धीरे आस्था और श्रद्धा का व्यवसाय बढ़ता चला जा रहा है और शायद कुछ समय पशचात सिर्फ ढोंग और दिखावा ही रह जायेगा |

तो अपनी आस्था का सौदा ऐसे न होने दे, आस्था और ढोंग के बीच के फर्क को पहचाने और दिखावे से बचे | उन कर्म-कांडों से बचे जो हम अब तक खुद की जिद्द से या फिर किसी के दबाव में करते आ रहे है | भगवन यह नहीं कहते कि मुझे रोज़ पूजो अपितु जब भी पूजो बस दिल से पूजो | तो चलिए, अपनी सच्ची श्रद्धा की ओर न की ढोंग की ओर... |